जीवन, अपेक्षाएं और हम
उम्मीद । ये एक ऐसा शब्द है जो मन में आशा की एक किरण दिखाता है। हारे हुए को होंसला मिलता है, फिर से एक बार और प्रयास करने का। जब तक मन में एक उम्मीद है, इंसान अपने हालातों को बदलने की, अपनी स्तिथि को सवारने की क्षमता रखता है। और इस उम्मीद के कारण ही वह अपने प्रयासों से सफल हो जाता है। अपनी ज़िन्दगी को और बेहतर बनाता है।
परंतु जब हम किसी भी चीज़ से अधिक उम्मीद जोड़ लेते हैं, तो वो हमारे दुःख का कारण भी बन जाती है। हम मनुष्य अपेक्षाओं से बंधे रहते हैं। हद से ज़्यादा की गयी उम्मीद ठेस पहुंचाती है।
उदहारण के तौर पर मैं मनुष्य की दूसरे मनुष्य से बाँधी गयी उम्मीदों पर कुछ कहना चाहूंगी।
हम अपने जीवन काल में न जाने कितनी उम्मीदें पाल लेते हैं। इनमे से ज़्यादातर बेबुनियाद उम्मीदें हमें एक न एक दिन पीड़ा ज़रूर देती हैं। हम अपने जीवन की हर ख़ुशी का स्त्रोत इन अपेक्षाओं को मान लेते हैं।
हम इस बात को मान बैठे हैं के जैसा व्यवहार हम किसी से रखते हैं, सामने वाला भी हमें उसी तराज़ू में तोले। जो बलिदान हम उनके लिए करें या जो प्रेम हम उन्हें दें, हमें भी बदले में सब कुछ उतना ही मिले। कम नहीं। और ये ही एक इंसान की सबसे बड़ी गलती होती है। समय रहते हम मनुष्यों को अपनी इस गलती का एहसास नहीं हो पाता, ना ही हम ऐसे गंभीर सवालों पर वक्त रहते समय ज़ाया करते। गलती का एहसास तब होता है, जब दूसरा मनुष्य इन उम्मीदों पर खरा नही हो पाता। तब हमारी बुनी गयी उम्मीदें हमें ठेस पहुंचाती हैं। सिलसिला यहीं खत्म नहीं होता। कुछ ऐसे भी मनुष्य होते हैं जो एक बार नही बार बार अपनी अपेक्षाओं की वजह से दुःख पाते हैं। ऐसे व्यक्ति निर्बल होते हैं। जो मनुष्य अपनी गालतियों से नही सीखता, वह आगे नही बढ़ पाता। उसके जीवन का आधार बस दूसरों से बाँधी गयी उम्मीदें बन जाती हैं। बेबुनियाद उम्मीदें।
हम बचपन से एक बात सुनते आएं हैं की हमें किसी भी इंसान की निःस्वार्थ भाव से मदद करनी चाहिए। ये हमारा धर्म हैं। बिना किसी उपहार या शाबाशी के बदले हमें एक दूसरे का साथ देना चाहिए। किन्तु मनुष्य कहाँ टिक पाता है। अपेक्षायें बंध ही जाती हैं।
प्रेम भी एक निःस्वार्थ भावना है। प्रेम दूसरे इंसान को भी हमसे उतना ही गहरा हो, ये उम्मीद हम पाल लेते हैं। लेकिन सत्य तो ये है के हम मनुष्य एक दूसरे से भिन्न हैं। हमारी सोच, हमारे भाव, हमारी पसंद नापसंद, हमारे उसूल ज़रूरी नही के दूसरे से हू बहू मिलें। किन्तु प्रेम में मनुष्य सुध बुध खो बैठता है। वह उचित अनुचित के अंतर को समझ नहीं पाता। वो अपनी खुशियों का आधार उस व्यक्ति को मान लेता है। उससे उम्मीद बंधने लगती हैं।
प्रेम में इंसान को बाँधा नहीं जाता बल्कि स्वतंत्र रहने का आनंद प्रदान किया जाता है। किसी मनुष्य से प्रेम करना वो हमारे बस में है, परंतु वो भी हमें उतना ही प्रेम दे ये हमारे बस में नहीं। हम उससे किसी भी प्रकार की उम्मीद लगाये ये उचित नहीं।
हां ये सत्य है की हमें अपेक्षायें किसी से नहीं रखनी चाहिए परंतु एक सत्य यह भी है के हम इंसान है। इंसान इतना सक्षम नहीं के अपनी भावनाओं पे अधिकार करले। जाने अनजाने में उम्मीद बंध ही जाती है।
किंतु हम किसी और से उम्मीद न लगा कर खुद से लगाएं तो क्या ये उचित नहीं? हम अपने आप को सुधारें, किसी लक्ष्य प्राप्त करने की उम्मीद खुद से बांधें, अपने आप को बेहतर से बेहतरीन बनांए, तो क्या जीवन और मधुर प्रतीत न होगा।😊
Comments
best of things. It's not bad. It gives
you power. It's the expectations which
cause sadness not the hope.
Hope - ummeed
Expectations - apekshahye